“अरावली को मत छुओ!” – सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश, सफारी पर ब्रेक

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

Supreme Court of India ने अरावली माउंटेन रेंज में प्रस्तावित जंगल सफारी प्रोजेक्ट पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि जब तक इसकी वैज्ञानिक और कानूनी सीमाएं तय नहीं होतीं, तब तक कोई भी परियोजना यहां शुरू नहीं हो सकती।

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अरावली उत्तर भारत की ecological security का backbone है। यह सिर्फ एक पहाड़ी इलाका नहीं, बल्कि climate balance, groundwater recharge और pollution control की natural system है।

Haryana Government का Jungle Safari प्लान क्यों अटका?

Government of Haryana ने गुरुग्राम और नूंह क्षेत्र में बड़े पैमाने पर Jungle Safari Project का प्रस्ताव रखा था। दावा किया गया कि यह eco-friendly tourism model होगा।

लेकिन अदालत ने पूछा, “जब तक ये तय नहीं कि Aravalli की वास्तविक सीमा कहां तक है, तब तक परियोजना किस आधार पर?”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि development के नाम पर ecological ambiguity स्वीकार नहीं की जा सकती।

“Aravalli सिर्फ Haryana की नहीं” – कोर्ट की अहम टिप्पणी

पीठ ने कहा कि Aravalli कई राज्यों से होकर गुजरती है। इसलिए इसका संरक्षण सिर्फ एक राज्य का विषय नहीं, बल्कि national environmental responsibility है। अब एक expert committee गठित की जाएगी, जो Aravalli की scientific mapping और legal demarcation तय करेगी।

Environment vs Development: संतुलन या टकराव?

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि Aravalli पहले ही mining, illegal construction और land misuse से जूझ रही है। अगर स्पष्ट सीमांकन के बिना परियोजनाएं मंजूर होती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए irreversible damage हो सकता है।

Supreme Court का यह फैसला एक clear message देता है, Development जरूरी है, लेकिन ecological red line पार करके नहीं।

“पहले नक्शा साफ करो, फिर जंगल में घूमो!” लगता है कोर्ट ने सरकार से कह दिया है — Safari पर जाने से पहले GPS अपडेट कर लो!

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